Heart Touching Emotional Sad Shayari

मनाई होगी सबनें खुशियाँ बहुत लेक़िन…
मैं मर गया हूँ अंदर से अब जश्न किस बात का हो…!!

पहरेदार लगे हैं उनकी यादों को रोकनें में…
पर वो सब के सब… हमारी ही तरह आशिक़ ठहरे…!!

शायद वो बेहतर की तलाश में हैं…
और मैं अच्छा भी नहीं हूं…!!

जागता रहता हूं मैं अक्सर
सारी सारी रात
लगता है इन आंखों में नींद बची ही नहीं…!!

जिन्हें तुम मिली वो तुम्हें समझ ही न सके
और यहां हमने तुम्हें जर्रे जर्रे में लिख रखा है…!!

अब नहीं रखते हम किसी से
शौक़-ए-मोहब्बत…
बेरहम लोग हैं
दिल तोड़ देते हैं…!!

बड़े कर्ज़ हैं जो शायद मैं चुका न पाऊँ…
मेरी दुनियाँ में हर एक शख़्स मददगार रहा है…!!

तुम पूछ लो खैरियत अगर
इशारों इशारों में
गजब का हो जाएगा
वो नज़ारा हज़ार नज़ारों में…!!

एक ओर हम… एक ओर वो…
ये बीच के फासले की दूरी है…!!

कब से खरीद लेनें की फिराक़ में है वो मेरे ज़हन की ज़मी को…
मग़र बाज़ार-ए-इश्क़ में हम अपनीं क़ीमत बढ़ाते रहे है…!!

बेवज़ह शौक़ न पालिए मोहब्बत वोहब्बत का…
खाक़ हो गए जान से भी जियादा चाहनें वाले…!!

लोगों को क्या मालूम कि हम पुरानें खरीददार हैं…
उन्हें तो क़ीमत मतलब था हमें… चीज की समझ थी…!!

अलग हैं मायनें ख़ुशी के… सभी के लिए…
कोई मर जाना चाहता है तो कोई जीना…!!

रोशन है तुझसे मेरे प्यार का ज़हां
जो बात तुझमें है
वो किसी और में कहां…!!

ये भी अच्छा है सिर्फ सुनता है दिल
अगर बोलता तो क़यामत होती…!!

किसी के पास सब कुछ है
तो बातें करने का भी वक्त नहीं
और किसी के पास कुछ भी नहीं
फिर भी बहुत सारा वक्त सिर्फ यादों में बीता देते हैं…!!

सब समझते हैं मैं बुरा हूँ बहुत…
तुमनें आख़िर क्यों ये बात नहीं समझी…
मेरे दरिया में दिखावा कम है साक़ी…
पर… दुनियाँ नें क़भी भी हक़ीक़त की  बात नहीं समझी…!!

छोड़ो इन सारे किस्सों को
इन वादों को
इन इरादों को
तुम आईना देखो
और बताओ
मेरी पसन्द कैसी है…??

मोहब्बत के होते हैं दो तोहफे
किसी को मिलती हैं बेपनाह मोहब्बत
तो किसी के हिस्से में सिर्फ दर्द आता है…!!

कितना मुश्किल होता है किसी का इंतजार करना
खाश कर तब
जब आपको पता हो
कि वो कभी आपके पास लौट कर नहीं आने वाला…!!

सोन पापड़ी की भीड़ में
मेरी वाली काजू कतली है…!!

एक शाम
दो कप चाय
ठंडा मौसम
पहाड़ों कि वादियां
तुम
मैं
और
कुछ बातें

कैसे कहूं इस दिल के लिए
कितने खाश हो तुम…
फासले तो कदमों के हैं
पर हर वक्त दिल के पास हो तुम…!!

मैनें बड़े ग़ौर से देखी थी आँखें उसकी…
न आँसू था… न जानें का ग़म कोई…!!

कोई कोशिश करनें के इरादे से उतरा तो ठीक रहा…
जिसनें खेल समझा वो दरिया से वापस नहीं आया साहब…!!

इत्तेफ़ाक़ नहीं था मेरा मिलना उनसे…
मैं पहले इश्क़ मानता ही नहीं था इस क़दर का…!!

मुझे मालूम नहीं कबतक अपना पाऊंगा इस शहर को…
मेरा शहर लेकिन था इससे बेहतर…!!

सब आदत छोड़ सकता हूं…
एक तुम्हारे लिए
एक तुम्हारे सिवा…!!

चलो कुछ पल खुल कर जीते हैं
सुबह का वक्त है
आओ चाय पीते है…!!

स्त्री का बचपन बचा कर रखता है
वह पुरुष जो उससे सच्चा प्रेम करता है…!!

मना कर नहीं पता मैं बेवकूफ़ी भरी बात उसकी…
लगता है मुझे इस पगलपनें से इश्क़ हो गया है अब…!!

मेरा किसी पर कुछ भी हक़ नहीं बनता…
पर वो रिश्ता मैनें ख़ुद बनाया था हक़ीक़त के दम से…!!

तुम मशरूफ़ हो… ठहर नहीं सकते फिर भी…
यक़ीन मानों को अकेले को ज़िन्दगी अच्छी नहीं होती…!!

यादों की अहमियत तब नहीं होती
जब इन्सान चले जाते हैं
उनकी अहमियत तब होती है
जब आपको अहसास हो
कि आप उस जैसी एक और नई याद नहीं बना सकते…!!

असली प्यार का मतलब
हासिल करना नहीं होता…!!

मिलना और बिछड़ना
हमारे हाथ में नहीं होता
अगर ऐसा होता
तो मैं तुम्हें कभी जाने ही ना देता…!!

हमें दुनिया से कोई शिक़ायत नहीं साहब
वो तो है ही मतलबी
हमें सारी शिकायतें खुद से हैं
इतना कुछ देखते सहते हुए भी हम कभी…
हम कभी मतलबी ना हो पाए…!!

कहीं मुलाकात हो जाए… तो पूछ लेना साहिब…
क्या जिस्मों की मोहब्बत काफ़ी पड़ी…??

ये दुनियाँ ऐसी क्यों है…
अच्छा देखकर भी भरोसा होता क्यों नहीं…!!

बदल जाएँगे हालात भी एक वक्त…
सुना है अंधेरा भी गुज़र जाता है काली रात के बाद…!!

अकेले हो कर तुम उदास होते हो
कौन मनाता है जो नाराज़ होते हो…
कुछ भी तो नहीं अब गंवाने को
आंसु पोंछो, बेबात रोते हो…!!

कोई रात
वो चांद
तुम और मैं
किसी छत के मुकद्दर में हो
तो बात बने…!!

कह दिया तो था कि ज़ख्म सब भर गए हैं… लेक़िन…
हक़ीक़त ये है कि चीथड़े जुड़कर पहले जैसे नहीं बनते…!!

रूठ जाती है जिंदगी
इतनी सी बात पर…
नहीं होती अब ख़ुशी
किसी भी बात पर…
जिसके साथ कभी
रात भर करी बातें…
अब उस शख्स को
सोचता हूं रात भर…!!

जिम्मेदारियों की एक खूबी होती है…
ये आपको कभी बिगड़ने नहीं देती…!!

एक आदत सी लग गई है मुझे
तुमको हर पल याद करने की…!!

इन्सान अपनी ही लगाई गई उम्मीदों से
चोट खाता है…!!

आप ही के बिना हूं क्यूं बेचैन
आप ही क्यूं मेरी जरूरत हैं…
वहम इतना हंसी नहीं होता
वाकई आप ख़ुबसूरत हैं…!!

तुम कहीं ज़्यादा गहराई में उतर गए होगे…
दरिया-ए-इश्क़ में इसकी ईजाज़त नहीं होती…!!

जब मर्ज़ बड़ा है तो ईलाज़ भी मुश्किल होगा…
ये बात क्यों नहीं समझते दीवानें सारे…!!

जीना नहीं चाहते को ख़ुद को आख़िरी मौका दो…
अब सबकी चिंता छोड़कर ख़ुद को मौका दो…!!

खुश हु बाहर से
अन्दर से शिकायतों से भरा पड़ा हूं
भावनाएं खत्म सी है
जैसे लगता है मैं मरा पड़ा हूं…
कोई शक्श चाहिए
जो थोड़ा सा संभाल सके मुझे
सबको सहारा देता हूं मैं
यार अंदर से बिखरा पड़ा हूं…!!

हां मैं अक्सर अपनी बातें
छिपा लेता हूं….
हंसी नहीं आती किसी भी बात पर
मगर सबके सामने मुस्कुरा लेता हूं…!!

आंखों में आसू हैं
पर किसी को दिखा नहीं सकता
दिल दर्द से फटा जा रहा है
इससे ज्यादा बता नहीं सकता…!!

किस तरह का इश्क़ चाहता होगा…
वो क़यामत है… क़यामत ही शायद… चाहता होगा…!!

अच्छे सबक के लिए भी…
वक्त का बुरा होना जरूरी है…!!

मैं एक काली अंधेरी रात हूं…
तुम मेरा रोशनी वाला चांद बन जाओ…!!

माथा चूमकर इश्क़ जताने वाले…
होंठों की ख्वाहिश नहीं रखते…!!

लोग भांडों को जब तलक हीरो समझते रहेंगे…
मुल्क़ में तब तलक हस्तियों का अपमान होगा…!!

काली साड़ी
लाल लिपस्टिक
हाथों में मेहंदी
चांदी के कंगन
खुले बाल…
फिर….
फिर क्या…
लड़का बर्बाद…!!

तेरे श्रृंगार में शामिल हो मेरा भी हिस्सा…
तेरे चेहरे पर मैं भी कहीं तिल हो जाऊं…!!

ये जो सांसें तुम्हारी इतनी महकती है…
कहीं नथनी से तुम इत्र तो नहीं छिड़कती…!!

ये सुर्ख लब…
ये माथे की बिंदी…
ये मदहोश नजरें…
ये नाक की नथनी…
और ये झुमके….
हाय……
इतने कम फासलों पर तो
मयखाने भी नहीं होते…!!

वज़हें बताई जा रही थी उनसे इश्क़ करनें की…
मैं बेवकूफ़ कुछ कह ही न सका…!!

तमाम कोशिशों के बाद मैं ज़िन्दा हुआ हूँ…
आज अरसे बाद एक नें कहा – अच्छे लग रहे हो…!!

तुम सोचते होगे मैं बेकार आदमीं हूँ…
यक़ीनन मेरा भी मानना मेरे बारे में यही है..!!

बहुत ही शरारती है
ये तेरी आवारा नथनी…
ज़ेवर का बहाना बना के
तेरे होठों को चुमती है…!!

कह दो इन झुमके, पायल, कंगन, मेहंदी से…
श्रृंगार पूरा होता है तो सिर्फ एक चुनर से…!!

इरादा उनका भी वही था बस छुपाना था उन्हें…
उनकी आदत है हमें अदाओं से घायल करना…!!

क्योंकि इस बार भी उतना ही नज़रन्दाज़ किया गया…
मैं सोचता हूँ छोड़ दूँ ये ज़िद मोहब्बत की…!!

उसके बाल भी बने थे
उसने काजल भी लगा रखा था
उसके झुमकों ने तो मेरा दिल
अलग ही चुरा रखा था…!!

आजादी इतनी है मेरे प्यार में…
अगर तुम चाहोगे तो बन्ध जाऊंगा
मगर कभी तुम्हें बांधने की कोशिश नहीं करूंगा…!!

मिलूँगा कभी तो कह दूँगा अलविदा उनसे…
ये मेरी ज़िंदगी की आख़िरी मुलाक़ात थोड़ी थी…!!

ये क्या उलझन है… ये क्या खुशियाँ…
मर चुकी जिस्मों में एहसास नहीं होता…!!

मेरा ज़्यादा ख़याल ठीक नहीं है साहब…
सुना है बुरा सोचनें से बुराई भागती नहीं…!!

की रहूं हमेशा उसकी कलाईयां पकड़ें…
ख़ुदा मुझे उसके हाथों की चूडियां कर दे…!!

वो घूंघट में भी
चमकता हुआ
महताब लगती है…
और झुकी पलकों
को जरा उठा दे तो
आफताब लगती है…
देखकर उसको नशा
कुछ यूं चढ़ता है…
कि उसके आगे
फीकी शराब लगती है…!!

तन्हा आदमी अक्सर..
अपने आप से ही बातें किया करता है…!!

हमारी किस्मत तो आसमान
पे चमकते सितारों की तरह है…
लोग अपनी तमन्नाओं के लिए
हमारे टूटने का इंतजार करते है…!!

कौन कहता है
संवरने से बढ़ती है खुबसूरती….
दिलों में चाहत हो तो
चेहरे यूं ही निखर आते हैं…!!

रोने की वज़ह भी न थी
न हंसने का बहाना था…
क्यों हो गए हम इतने बड़े
इससे अच्छा तो वो
बचपन का जमाना था…!!

इधर आ…
मैं लगा दूँ,
क्लिप बालों में सजा दूँ…
वैसे…
खुले बाल अच्छे लगते हैं मुझे,
ख़्वाहिश अपनी तुम्हें बता दूँ…!!

तुम क्यों नहीं माँग लेते जिंदगी मेरी…
जिंदा रहकर भी कौन सा जिंदा हूँ मैं तुम्हारे बग़ैर…!!

बड़े बोझिल लगा करते थे बस्ते वो स्कूल के…
अब उन्हीं बस्तों नें जैसे सुकून याद आता है…!!

तमन्ना तो बहुत चीजों की हुआ करती है…
तुम मेरा वो ख़ाब हो… जो ज़िद है मेरी…!!

आओ कभी चाय पर
फिर सुनेंगे तुम्हारी कविता….
मैं बनूंगा जेठालाल
और तुम मेरी बबिता….!!

क्या कहा जाएगा हमें मालूम तो नहीं…
सुनों मरनें के बाद कौनसा फर्क़ पड़नें वाला है…!!

देखकर तो कम से कम मुँह फेरा ना करो…
बिखर जाते हैं ज़हन के मकान बने बनाए…!!

वज़ह होगी कुछ न कुछ ज़रूर लेक़िन…
कभी कभी उलझ जाता हूँ जिंदगी के जाल में…!!

कुछ सवालों के जवाब मैं देना नहीं चाहता…
इत्तेफाक से जवाब है सब के सब मेरे पास…!!

ये तलब इश्क़ की है
या तुम्हें पाने का नशा है…
जो भी है कमबख्त
सारा मन बस तेरी याद में लगा है…!!

औरों पर हँस देना भी कितना आसान है…
ग़ौर करनें वाली बात है ख़ुद पर हँस पाना…!!

हिसाब माँगनें की बात आई तो मैं क्या माँगता…
मैनें सब दांव उसी की जीत पर तो लगाए थे…!!

कुछ नशा अच्छा हुआ करता है ज़ख्मों के लिए…
कुछ नशा ज़ख्मों को नासूर बना देता है…!!

मैं पुछता हुं मिलोगी मुझसे
वो परवाह नहीं करती
वो ना नहीं करती
वो हां नहीं करती
और जिसके लिए लिखी है
मैंने हर एक लाईन अपनी
वो सुनती सब है लेकिन वाह नहीं करती…!!

हिचकियां सताएं तो गुस्ताखी माफ़ करना,
मुझे तो आदत है तेरे ख्यालों में डूबने की…!!

भूल जानें की शर्त ली गई हमसे…
अब वो शर्त मेरी जान लेके मानेगी…!!

हँस के गिर पड़ा वो बावला ज़मीं पर…
कहता है सितारों से इश्क़ हो गया है उसे…!!

इस घर के आईनें में हमें अब अपनापन नहीं मिलता…
अपना वज़ूद खोकर मैं अब बदल सा गया हूँ शायद…!!

अपनीं परछाईं से भी अब मुझे डर लगता है…
ये इश्क़ का अंजाम नहीं है तो भला क्या है…!!

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